मंगलवार, 26 अगस्त 2014

संस्कृति अर संस्कारां री हेमाणी बाल-साहित्य रै मारफत टाबरां तांई पूगैला – डॉ. नीरज दइया

(साहित्य अकादेमी रै बाल साहित्य पुरस्कार री घोषणा पछै कवि, आलोचक अर बाल साहित्यकार डॉ. नीरज दइया सूं वरिष्ठ लेखक-कवि नवनीत पाण्डे री बातचीत)
नीरज जी सैं सूं पैली तो आपनै दोलड़ी बधाई। पैली आ कै बरसां बरस प्रकासण री खेचळ- अबखायां झेल’र ’जादू रो पेन’ पोथी रूप सांम्ही आयो अर दूजी कै इण नै केंद्रीय साहित्य अकादमी रै बाल साहित्य पुरस्कार री घोषणा करीजी है।
-    आ बधाई तो थोथी अर थोड़ै दिनां री है। भाई नवनीत जी, असली बधाई तो राजस्थानी भाषा नै आपरो वाजिब माण मिल्यां हुवैला। प्रकासण री अबखायां सूं पैली लिखण री अबखायां देखां। पत्र-पत्रिकावां री कमी अर मांग नीं हुवण सूं जिण गति सूं साहित्यकारां नै लिखणो चाइजै बो लिखणो कोनी हुवै। बाल साहित्य लेखन री गति साव धीमी है। कोई लिखै किण खातर? जद आपां देखां कै प्रकासण रा पूजता इंतजाम कोनी। लिखणो-छपणो दोनूं ई घर फूंक तमासा देखणा है। भादाणी जी री ओळियां मांय कैवां तो- जो पहले अपना घर फूंके, / फिर धर-मजलां चलना चाहे / उसको जनपथ की मनुहारें! तो भाई साब पोथी “जादू रो पेन” रै लिखण-छपण मांय लेखक अर प्रकाशक दोनूं धुन रा धणी है, अर इण पोथी रो जोग ई कीं इण ढाळै रो हो कै घणी उडीक पछै प्रकाशित हुवण रो जस मिल्यो। पुरस्कार नै म्हैं लेखन रै भेळै म्हारै खटाव रो फळ मानूं। आ पोथी तो बरसां पैली छपणी ही, अर उण बगत साहित्य अकादेमी रो ओ पुरस्कार ई कोनी हो। फेर लेखक पुरस्कार खातर कोनी लिखै, अर पुरस्कार खातर लिखै तो ई जरूरी कोनी कै पुरस्कार मिलै ई!    
म्हनै लागै कै एक लेखक नै टाबरां सारू लिखण खातर घणी खेचळ करणी पड़ै, भोत ई दोरो पण महताऊ काम है, आप इण बाबत कांई सोचौ?
-    कैवणिया कैवै कै राजस्थानी मांय लिखणो साव सोरो काम है। दावै जियां लिखो अठै पोल है। साची बात पण है कै पोल मांय पोल घसावणिया कीं बेसी हुयग्या है। पण पोल घणी दूर तांई चालै कोनी। गळी-गवाड़ तांई तो ठीक है। आप लेखक-कवि हुयां पछै जे खुद नै भारतीय लेखक रूप जांचण-परखण री भोळावण नीं समझणी चावो तो कोई हाथ थोड़ी पकड़ैला। लिखणो साइड-जोब दांई धंधो बणावणियां भाषा अर साहित्य रै माण नै हाण पूगावै। लिखणो तो असल मांय अंतस री बळत हुवै। टाबरां खातर लिखण मांय भाषा मेहतावू हुवै। घणी जरूरी बात- संस्कृति अर संस्कारां री हेमाणी बाल-साहित्य रै मारफत टाबरां तांई पूगैला, इण नै चेतै राखता बाल साहित्य लिखणो सोरो कोनी। लिखण सूं पैली जरूरी है कै लेखक खुद सूं सवाल करै कै क्यूं लिख रैयो हूं। कांई लिख रैयो हूं... बीजा लेखकां कांई लिख्यो है... आपरी परंपरा नै जाणिया बिना कोई मेहतावू काम कोनी करीज सकै। आज जरूरत है राजस्थानी नै भारतीय साहित्य मांय सिरै साबित करां। बिना विजन रै कोई काम करजै तद उण री पूग अर पूछ बेसी कोनी हुवै। राजस्थानी री रचनावां दूजी भाषावां मांय पूगैला तद अठै री सौरम समझी जावैला। अखबायां तो है पण अबखायां सांम्ही छाती कर राखी है, अर आपां लेखकां रो ओ काज तो लेखकां रै करियां ई सजैला।

आज जद दृश्य मीडिया टी.वी. चैनलां माथ टाबरां रा कार्टून प्रोग्रामां, मोबाइलां अर फूहड़ सीरीयलां रौ बोलबालौ है अर उणां री वजै सूं टाबर चज रै पाठ-पोथी सूं दूर हुय रैया है, एक लेखक रूप इसो कांई हुवणौ, का कैवां करीजणो करणो चइजै कै टाबरां री पोथ्यां भणणै में रुचि जागै?
-    बदळाव रै जुग मांय बजार समाज माथै हावी हुवतो जाय रैयो है। बगत मिनख नै मसीण बणावण नै खपै अर लेखक मिनख नै मिनख बण्यै रैवण रै जतन मांय मददगार साबित हुय रैयो है। संवेदना री बात आपां अठै री परंपरा, संस्कृति अर संस्कारां नै टाळ कियां कर सकां। टाबरां सांम्ही आज चौफेर जिकी दुनिया है उण मांय उणा सांम्ही चयन रा अवसर पैली करता बेसी है। ओ बदळाव कोई एक दिन मांय कोनी आयो। इण बदळाव रो कारण गांव अर शहर रो आपस मांय रळ जावणो कैयो जाय सकै। छोटी हुवती इण दुनिया मांय मिनख तर-तर मोटो हुवतो जाय रैयो है। चादरै सूं बेसी पग पसारण रा मारग घणा सोखा लागै। करजायती माइत आपरै घर मांय आराम री सगळी चीजां भेळी करै, पण जिकी विरासत लारली पीढी नै आगली पीढी नै सूंपणी है बा संस्कृति अर संस्कारां री हेमाणी बो बिसरावतो जावै। लेखक नै आपरै पाठ भेळै आं सगळी बातां सूं आंम्ही-सांम्ही हुवण री सोचणी पड़ैला। लिखण मांय जादू कोनी पण जादू रो पेन दिखाय’र आपां नै असली पाठ कै हुनर तो हाथ मांय हुवै, टाबरां नै सीखावण री भोळावण परोटणी पड़ैला। बां री आज री इण दुनिया सूं जुड़ परा ई किणी बदळाव री नींव आपां राख सकां। बाल साहित्य लेखन सूं पैली सगळी दुनियादारी बिसराय’र टाबर बण’र आ दुनिया देखणी-समझणी पड़ैला।   
बाल साहित्य में सिरजण कम हुवंतौ जा रैयौ है, भौत कम लिखारा है जिका लिखै.. आलोचक नीरज दइया इण री बजै कांई मानौ! क्यूं लेखक टाबरां कानी सूं इत्ता बेपरवाह है जद कै आज रै माहौल में टाबरां माथै ध्यान देवणौ सैंग सूं जरूरी लखावणो चाइजै..
-    नवनीत जी, आ बात आपां पैली करी अर अबै आलोचक री दीठ सूं कैवूं तो बुरो मानण री बात कोनी- लिखणियां बस सौख पाळै। जिको लेखक-कवि छठ-छमास लिखै बो लिखण मांय ई आळसी कोनी, बांचण मांय ई आळसी लखावै। पोथी मोल लेय’र बांचण री बात तो अळगी, आपां रा केई लेखक-कवि तो भेंट करियां पछै ई पोथी नै खोल’र देखै कोनी। मानीजता साहित्यकारां बाबत इण ढाळै री बात बेजा है। कारण कै साथळ उधाड़सां तो आपां ई लाजा मरसां। मोटा गिणजण आळा लेखकां रो ई हाजमो सफा खराब है, तो छोटियां री बात ई जावण दो। आलोचना री एक ओळी बरदास्त कोनी हुवै। संबंध खराब हुवण रै डर सूं धाको धिकावण री इण परंपरा रो अंत हुयां ई आपां आगै बध सकां। अबै बगत आयग्यो कै हरेक पाळां अर चकारियां सूं बारै निकळ’र भारतीय लेखन समाज मांय राजस्थानी री साख नै सवाई मांडण रा जतन करां। काल आपां री हेमांणी टाबर ई सांभैला। आज जे बगतसर चेतो नीं करांला तो काल आपां रो रोवणो म्हनै सांम्ही दीसै। आ बात पक्की है कै संस्कृति अर संस्कारां री हेमाणी बाल-साहित्य रै मारफत ई टाबरां तांई पूगैला।    
डॉ. नीरज दइया बाबत आ घारणा प्रचारित करीजती रैयी है कै विवाद-प्रियता बेसी है। लिखो-पढो तो खूब पण चरचा मांय रैवण खातर चौळका ई करो। इण पेटै कांई कैवोला?
-    भाई नवनीत जी, ओ सवाल है का किणी री कोई सूचना। असल मांय म्हारै माथै म्हारै केई मानीता लेखकां रो लाड बेसी है, अर बै म्हारै काम माथै ध्यान बेसी देवै। म्हारी सरलता अर सहजता मांय कैयोड़ी लिख्योड़ी ओळी रा केई-केई अरथ बै ई सोचै अर करै। स्यात म्हरै लिखण मांय ई कोई कमी रैयी जावै कै म्हैं बां सगळा सीगै नै बंद कोनी कर सकूं। कहाणी आलोचना री म्हारी नुंवी पोथी “बिना हासलपाई” छप्यां पैली ई घणी चरचा मांय लावण रो जस सिध करै कै चौळकां करूं कोनी हुय जावै। आलोचना अर आलोचक रो सुभाव बिना हासलपाई रो हुवणो चाइजै। म्हैं म्हारै सूं सजता जतन करिया अर आप नै इण मांय जळेबी दीसै तो म्हारो कैवणो है कै म्हारो खून एबी पोजिटिव है अर मीठो पसंद हुवण रै उपरांत ई डागदर बंद करण रो कैय दियो। डागदर कैवै कै सूगर है, अर म्हारा मानीता लेखक मानै ई कोनी कै म्हैं मीठो आलोचक हूं। बै खारो तूबै जिसो मानै। जद आलोचना मांय म्हैं म्हारै जीसा सांवर दइया री आलोचना करण मांय ईमानदारी बरत सकूं, तो म्हनै लगै कै बिना हासलपाई आलोचना हुवणी चाइजै। आलोचना मांय रचनकार री ठौड़ पाठ नै प्रमुखता मिलणी चाइजै। किताब "बिना हासलपाई" बजार में आयगी है जिका नै इण पेटै किणी हासलपाई री हूंस हुवै बै पूरी करैला। काळै नै सौ बार गोरो कैयां सूं गोरै रो भरम तो हुय सकै, पण काळो तो काळो ई रैवैला। आलोचक उण टाबर दांई हुवै- जिको नागै राजा री पोल खोलै। आलोचना लिखती बेळा म्हारो असूल हुवै कै भरम नै भांग’र सांच नै बांचणियां री आंख्यां सांम्ही लाय सकूं। “बिना हासलपाई” ऐंड कोनी एक सरुआत है... किणी कहाणीकार रै हुवण नीं हुवण सूं बेसी मेहतावूं है जिका बाबत जिकी बात जिण दीठ सूं करण री बिध करी है, उण री परख करी जावणी चाइजै। आपां रा मारग एक है तद गळी मांय लुकण सूं काम कोनी चालै। ओ लाइव शो है, आप अर म्हैं पाठकां साम्हीं हा... फैसलो तो अंतपंत पाठक अर आवणियो बगत ई करैला।

(दैनिक युगपक्ष : मंगलवार  26 अगस्त, 2014)

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Dr. NEERAJ DAIYA's POETRY BOOK (RAJASTHANI); Tr. by- RAJNI CHHABRA

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